प्रोटीन सप्लाई चेन में बड़े जोखिम, दक्षिण भारत पर सबसे ज्यादा संकट

एशियाई बेंचमार्क रिपोर्ट में खुलासा, जलवायु और एंटीबायोटिक के मामले में कंपनियां फिसड्डी, SEBI के सख्त नियमों के बीच आई रिपोर्ट

नई दिल्ली: भारत की बड़ी फूड कंपनियां अपने प्रोटीन सप्लाई चेन (यानी मीट, दूध, अंडा और मछली) में छिपे बड़े खतरों को अभी भी ठीक से नहीं संभाल पा रही हैं। एक नई एशियाई बेंचमार्क रिपोर्ट में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, जलवायु जोखिम, एंटीबायोटिक के अंधाधुंध इस्तेमाल और कमजोर प्रबंधन (गवर्नेंस) के मामले में हालात ठीक नहीं हैं। ये सारे जोखिम सबसे ज्यादा दक्षिण भारत में केंद्रित हैं, क्योंकि यह इलाका देश का सबसे बड़ा अंडा, पोल्ट्री और मछली उत्पादक क्षेत्र है I

बेंचमार्क रिपोर्ट की बड़ी बातें

एशिया रिसर्च एंड एंगेजमेंट (ARE) ने अपनी ताजा रिपोर्ट ‘एशिया प्रोटीन बायर्स 100’ में 13 भारतीय कंपनियों का आकलन किया है। इनमें नेस्ले इंडिया, ब्रिटानिया, टाटा कंज्यूमर, हिंदुस्तान यूनिलीवर और डोमिनोज जैसी बड़ी कंपनियां शामिल हैं I

अच्छी खबर यह है कि भारतीय कंपनियों ने अपने स्कोर में सुधार किया है। 2023 में जहां औसत स्कोर करीब 7 फीसदी था, वह 2025 में बढ़कर 16 फीसदी हो गया। यह एशिया के औसत स्कोर के बराबर है। 13 में से 11 कंपनियों ने पिछले साल के मुकाबले अपने प्रदर्शन में सुधार किया है I

दक्षिण भारत पर क्यों है सबसे ज्यादा संकट?

यह रिपोर्ट दक्षिण भारत के लिए खास तौर पर अहम है। सरकार के पशुपालन आंकड़ों के मुताबिक, आंध्र प्रदेश अकेले देश के 18.37 फीसदी अंडों का उत्पादन करता है। तमिलनाडु का हिस्सा 15.63 फीसदी, तेलंगाना का 12.98 फीसदी और कर्नाटक का 6.67 फीसदी है। यानी ये चारों दक्षिणी राज्य मिलकर देश के कुल अंडा उत्पादन का 53.65 फीसदी हिस्सा अकेले पैदा करते हैं . इसी तरह मछली उत्पादन में भी आंध्र प्रदेश देश में नंबर वन है, जबकि तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल भी बड़े समुद्री मछली उत्पादक हैं I

इतना बड़ा उत्पादन एक इलाके में केंद्रित होने का मतलब है कि अगर वहां जलवायु संकट आया, बीमारी फैली या फिर एंटीबायोटिक इस्तेमाल को लेकर नियम सख्त हुए, तो असर सीधे इन कंपनियों की बैलेंस शीट पर पड़ेगा I

कहां है सबसे बड़ी कमजोरी?

रिपोर्ट बताती है कि सबसे बड़ी कमजोरी प्रबंधन (गवर्नेंस) में है। एशिया भर में गवर्नेंस का औसत स्कोर सिर्फ 4.5 फीसदी रहा। ज्यादातर कंपनियों के बोर्ड प्रोटीन सप्लाई चेन से जुड़े जोखिमों पर औपचारिक नजर नहीं रख रहे हैं I

आधी से ज्यादा भारतीय कंपनियों ने जलवायु से जुड़े अहम संकेतकों पर खुलासा करना भी शुरू नहीं किया है। खासकर स्कोप 3 एमिशन (यानी सप्लाई चेन से होने वाला उत्सर्जन) और ट्रांजिशन प्लानिंग पर जानकारी नहीं दी जा रही है I

एंटीबायोटिक इस्तेमाल और एनिमल वेलफेर के मामले में भी हालत पतली है। एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) यानी एंटीबायोटिक का असर खत्म होने का खतरा बड़ा है, लेकिन इस पर नीति बनाने वाली कंपनियां न के बराबर हैं I

SEBI के सख्त नियमों के बीच आई रिपोर्ट

यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब भारत में ESG डिस्क्लोजर (यानी पर्यावरण, सामाजिक और प्रशासन से जुड़े खुलासे) के नियम सख्त हो रहे हैं। SEBI के BRSR फ्रेमवर्क के तहत टॉप कंपनियों को अब अपनी वैल्यू चेन का डेटा भी देना होगा। वित्त वर्ष 2025-26 से यह नियम टॉप 250 कंपनियों के लिए वॉलेंटरी होगा और 2026-27 से मैंडेटरी हो जाएगा I

इसका मतलब है कि अब कंपनियों को अपने सप्लायर्स और डिस्ट्रीब्यूटर्स के ESG डेटा पर भी नजर रखनी होगी। फूड कंपनियों के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती है, क्योंकि उनका सबसे ज्यादा कार्बन फुटप्रिंट लाइवस्टॉक और फीड प्रोडक्शन से ही आता है [

भविष्य की राह

ARE के डायरेक्टर रितुज साहू का कहना है कि “भारत इस बात की मिसाल बन सकता है कि इमर्जिंग मार्केट किस तरह प्रोटीन ट्रांजिशन को मैनेज करते हैं। अब जरूरत है कि इस मोमेंटम को मेजरेबल एक्शन में बदला जाए – चाहे वह सोर्सिंग हो, जलवायु हो या जिम्मेदार एंटीबायोटिक इस्तेमाल” I

एक्सपर्ट्स का मानना है कि प्रोटीन सोर्सेज में विविधता लाना भी जरूरी है। प्लांट बेस्ड और दूसरे सस्टेनेबल ऑप्शन को बढ़ावा देना सिर्फ पर्यावरण के लिए ही नहीं, बल्कि इंडस्ट्री के जोखिम कम करने के लिए भी जरूरी है I