स्ट्रोक और ब्रेन इंजरी के मरीजों के लिए वरदान साबित होगी यह तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से काम करेगा यह उपकरण
बेंगलुरु: भारत में विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में एक बड़ी छलांग लगाई जा रही है। भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) ने एक बेहद महत्वाकांक्षी परियोजना शुरू की है, जिसे ‘मूनशॉट’ नाम दिया गया है। इस प्रोजेक्ट के तहत वैज्ञानिक ऐसे खास उपकरण (ब्रेन को-प्रोसेसर) बनाएंगे, जो इंसान के दिमाग को फिर से काम करने में मदद कर सकते हैं।
क्या है यह प्रोजेक्ट?
आईआईएससी के वैज्ञानिक ऐसे उपकरण विकसित कर रहे हैं जिन्हें दिमाग में लगाया जा सके या फिर सिर के ऊपर पहना जा सके। ये उपकरण आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से काम करेंगे। इनका मकसद उन लोगों की मदद करना है, जिनका दिमाग स्ट्रोक, चोट या किसी बीमारी की वजह से सही तरीके से काम नहीं कर पाता।
कैसे काम करेगी यह तकनीक?
हमारा दिमाग करोड़ों न्यूरॉन्स से मिलकर बना होता है, जो लगातार आपस में सिग्नल भेजते रहते हैं। जब किसी हादसे या बीमारी से यह तंत्र बिगड़ जाता है, तो याददाश्त जाने या शरीर के अंगों को हिलाने में दिक्कत होने लगती है।
आईआईएससी में बनने वाला ब्रेन को-प्रोसेसर इन्हीं टूटे हुए कनेक्शन को जोड़ने का काम करेगा। यह दिमाग के अंदर जाने वाले और बाहर आने वाले सिग्नल को समझेगा, उन्हें प्रोसेस करेगा और फिर खराब हिस्से को बायपास करके सही जगह सिग्नल पहुंचाएगा। यह उपकरण न्यूरोमॉर्फिक हार्डवेयर पर काम करेगा, यानी यह बिल्कुल इंसानी दिमाग की तरह सोचेगा और सीखेगा।
किसके पैसे से हो रहा है यह काम?
इस बड़े प्रोजेक्ट के लिए पैसा प्रतिक्षा ट्रस्ट दे रहा है। यह ट्रस्ट इंफोसिस के फाउंडर नंदन नीलेकणी और उनकी पत्नी रोहिणी नीलेकणी ने बनाया है। उनका यह ट्रस्ट पहले भी विज्ञान और शिक्षा के कई कामों में मदद कर चुका है। माना जा रहा है कि इस प्रोजेक्ट से दिमागी बीमारियों के इलाज के क्षेत्र में बड़ी सफलता मिल सकती है।
भारत के लिए क्यों है खास?
अब तक दिमाग से जुड़ी ऐसी तकनीक सिर्फ अमेरिका और यूरोप के कुछ देशों में ही बन पाई थी। भारत में पहली बार इतने बड़े स्तर पर इस तरह का शोध हो रहा है। यह प्रोजेक्ट न सिर्फ दवा के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाएगा, बल्कि दुनिया को भी एक नई दिशा देगा।
क्या होगा फायदा?
इस तकनीक के कई फायदे होंगे।
सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि स्ट्रोक या पैरालिसिस के मरीज फिर से चल-फिर सकेंगे।
दिमाग की चोट के बाद जो मरीज बोलना या याद रखना भूल जाते हैं, उन्हें नई जिंदगी मिल सकेगी।
अल्जाइमर और पार्किंसंस जैसी बीमारियों के इलाज में भी यह कारगर साबित हो सकता है।
आईआईएससी के निदेशक का कहना है कि यह सिर्फ एक शुरुआत है। आने वाले 5 से 10 सालों में यह तकनीक आम लोगों तक पहुंच सकती है। इस प्रोजेक्ट के जरिए भारत अब न्यूरोसाइंस और न्यूरोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में दुनिया के विकसित देशों से कदम से कदम मिलाकर चलेगा।







